शायद आज से चांद नही निकलेगा,
जब तक,
हिंदुस्तान के गुरुर में अब भी धंसे
वो नापाक फिदायीन परखच्चे,
और माँ भारती की गोद के नाकाबिल
वो चंद गद्दार मजहबी बच्चे,
वो नापाक फिदायीन परखच्चे,
और माँ भारती की गोद के नाकाबिल
वो चंद गद्दार मजहबी बच्चे,
जन्नतनुमां रास्तो पर जमी हुई जिहाद की
खुरदुरी नोंकदार पतरियां, और
बेउम्र शहादत के कतरों से सनी
वें आधे अधूरे बदनों की गठरियां,
खुरदुरी नोंकदार पतरियां, और
बेउम्र शहादत के कतरों से सनी
वें आधे अधूरे बदनों की गठरियां,
करोडों दिलों से उबल चले गर्म
लहू के सैलाब से धुलके पाक नहीं हो जाती,
शायद देश में चांद कभी नही निकलेगा,
नही...... कभी भी नही निकलेगा,
लहू के सैलाब से धुलके पाक नहीं हो जाती,
शायद देश में चांद कभी नही निकलेगा,
नही...... कभी भी नही निकलेगा,
तब तक -
अंधेरों की आदत डाल लो।
-- चिंतन पटेल
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