Saturday, February 16, 2019

हृदयांजली

मृत्यु को सेंध,
पीड़ा को वेध,
सुखड की खुश्बू के पार,
मुझे ताक रही है, वो अठासी आंखे।


ना तो उनमें धिक्कार है, ना ही मलाल,
उन गर्वित आंखों में थे, चंद धखधखते सवाल।
मलाल को मारा जा सकता है,
सवालो को टाला जा सकता है,
अरे धिक्कार पे भी ढीट हुआ जा सकता है।

पर,
दिल का एक टुकड़ा,
जो अभी तक प्रेक्टिकल न हो सका था,
उसपे उन आंखों की कुरेदो से खून रीस रहा था,

ना,
उनके सवालों के तो सारे जवाब थे उस प्रेक्टिकल
हुए पड़े दिल के मोटे टुकडे के पास,

मैं तो उन सवालों और मलालो के पार की
एक चीज से शर्मसार हुआ खड़ा था,
होठों पे नपुंसक निंदा का वार और,
हाथ में मौम की बांझ बत्ती लिए।

मैं वो उठा सकने के काबिल न था,
जो एक बोझ बरस रहा था,
उन अठासी जवान आंखों से,
एक उम्मीद, एक आस, अब भी थी उन्हें,
इस देश से...मुझ से....आप से..हम से।
और लावारिस लटकता वो एक सवाल,
क्या कभी हम "हम" हो पाएंगे?

- चिंतन पटेल

(In the painful memory of those 44 CRPF jawans brutally and cowardly killed on 14th Feb,2019 in Pulwama, Kashmir may this rage never let us rest in peace.....).

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